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October 19, 2026

बरेली की रावण वाली गली में 200 साल से पुतले बनाने की परंपरा, उत्तराखंड तक के कई जिलों में  होती है सप्लाई

बरेली। मजहब अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हुनर और इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता। उत्तर प्रदेश के बरेली में इसकी अनूठी मिसाल देखने को मिलती है। यहां करीब 200 साल से चली आ रही परंपरा के तहत कारीगर दशहरे के लिए रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले बनाते आ रहे हैं। मलूकपुर की रावण वाली गली से लेकर किला क्षेत्र के फूटा दरवाजा तक हिंदू-मुस्लिम कारीगरों की साझा मेहनत गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत तस्वीर पेश करती है। खास बात यह है कि यहां तैयार होने वाले पुतलों की मांग बरेली ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड तक है। देखिए, बरेली से हमारी यह खास रिपोर्ट।

200 साल पुरानी परंपरा, पीढ़ियों से जारी है हुनर

बरेली की गलियों में त्योहारों के साथ भाईचारे की परंपरा भी आकार लेती है। शहर के मलूकपुर की रावण वाली गली में दशहरे को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। यहां पीढ़ियों से कारीगर रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले बनाते आ रहे हैं। करीब 200 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा में हिंदू और मुस्लिम कारीगर मिलकर अपने हुनर और मेहनत से पुतलों को आकार देते हैं।

यह काम केवल रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत भी है। परिवारों के बड़े-बुजुर्गों से सीखा गया हुनर आज भी अगली पीढ़ी तक पहुंच रहा है। दशहरे के नजदीक आते ही इन गलियों में बांस, कागज और अन्य सामग्री से पुतले तैयार करने का काम तेज हो जाता है।

रावण के पुतलों की उत्तराखंड तक सप्लाई

बरेली में तैयार होने वाले रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों की मांग आसपास के इलाकों तक सीमित नहीं है। यहां से पुतलों की सप्लाई उत्तराखंड तक भी की जाती है। दशहरे के अवसर पर अलग-अलग स्थानों से मिलने वाले ऑर्डर कारीगरों के लिए कमाई का अहम जरिया बनते हैं।

त्योहार के मौसम में कारीगर दिन-रात मेहनत करके पुतलों को तैयार करते हैं, ताकि तय समय पर ऑर्डर पूरे किए जा सकें। हालांकि, बढ़ती लागत और बदलती मांग के बीच इस पारंपरिक काम को जारी रखना उनके लिए आसान नहीं रह गया है।

फूटा दरवाजा में पुतलों के साथ बनते हैं मोहर्रम के ताजिये

बरेली के किला क्षेत्र में फूटा दरवाजा और उसके आसपास की गलियां भी साझा संस्कृति की गवाह हैं। यहां कारीगर दशहरे के लिए रावण और मेघनाथ के पुतले बनाने के साथ मोहर्रम के लिए ताजिये भी तैयार करते हैं। त्योहार अलग-अलग हैं, लेकिन कला, मेहनत और हुनर लोगों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं।

इन गलियों में हिंदू और मुस्लिम कारीगरों का साथ मिलकर काम करना आपसी सद्भाव और भाईचारे का संदेश देता है। यही बरेली की गंगा-जमुनी तहजीब है, जहां धार्मिक विविधता के बीच वर्षों पुरानी परंपराएं आज भी लोगों को जोड़ने का काम कर रही हैं।

महंगाई ने बढ़ाई मुश्किलें, एक पुतले पर 10 से 11 हजार रुपये खर्च

पुतले बनाने वाले कारीगरों के सामने अब लागत बढ़ने की चुनौती भी खड़ी हो गई है। कारीगरों के मुताबिक, बांस के एक बंडल की कीमत पहले करीब 250 रुपये थी, जो अब बढ़कर लगभग 450 रुपये हो गई है। इसके अलावा मजदूरी और दूसरी जरूरी सामग्री का खर्च भी बढ़ा है।

एक पुतले को तैयार करने में तीन मजदूरों को चार से पांच दिन तक मेहनत करनी पड़ती है। सामग्री और मजदूरी मिलाकर एक पुतले पर करीब 10 से 11 हजार रुपये तक खर्च हो जाते हैं। बढ़ती महंगाई का असर पुतलों के आकार पर भी दिखाई दे रहा है। कारीगरों के मुताबिक, पहले 30 से 40 फीट ऊंचे पुतलों के ऑर्डर अधिक मिलते थे, लेकिन अब 20 फीट के पुतलों की मांग ज्यादा हो रही है।

घट रही है कारीगरों की संख्या

इस पुश्तैनी काम से जुड़ी एक और चिंता यह है कि नई पीढ़ी में पुतले बनाने के काम के प्रति पहले जैसी रुचि नहीं रह गई है। कारीगरों के मुताबिक, पहले करीब 20 युवक इस काम में लगे रहते थे, लेकिन अब उनकी संख्या घटकर लगभग 10 रह गई है।

मलूकपुर में वीरेंद्र कुमार चंद्रा का परिवार आज भी इस विरासत को आगे बढ़ा रहा है। सीमित कमाई, बढ़ती लागत और मेहनत के बावजूद ये परिवार अपनी परंपरा को जीवित रखने में जुटे हैं।

बरेली की रावण वाली गली की यह कहानी बताती है कि त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि साझा विरासत और आपसी भाईचारे का माध्यम भी हैं। यहां तैयार होने वाले पुतले बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक हैं, जबकि उन्हें बनाने वाले कारीगरों की साझा मेहनत इंसानियत और एकता का संदेश देती है।

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