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September 13, 2026

बरेली : सपा से फिर टिकट की आस लगाए बैठे डॉ. जीराज यादव: ‘फुटबॉल’ की करारी हार भूले नहीं आंवला के वोटर, टिकट न मिला तो किधर जाएंगे?

 

बरेली । राजनीति में महत्वाकांक्षा होना स्वाभाविक है, लेकिन जब महत्वाकांक्षा जमीनी हकीकत से आंखें मूंद ले, तो नतीजे वही होते हैं जो पिछले विधानसभा चुनाव में आंवला की जनता ने दिखाए थे। आंवला विधानसभा क्षेत्र से एक बार फिर समाजवादी पार्टी के टिकट के लिए जोड़-तोड़ शुरू हो गई है और इस कतार में सबसे आगे दिखने की कोशिश कर रहे हैं डॉ. जीराज यादव। वही डॉ. जीराज यादव  जिन्हें पिछली बार जब सपा ने सिंबल नहीं दिया था, तो उन्होंने बगावत का झंडा बुलंद कर निर्दलीय ताल ठोक दी थी।

फुटबॉल’ चुनाव चिन्ह पर जनता ने दिखाया था बाहर का रास्ता:

पिछली बार टिकट कटने के बाद खुद को जनता का निर्विवाद मसीहा साबित करने निकले डॉ. जीराज यादव ने हाथ में ‘फुटबॉल’ चुनाव चिन्ह थामा था। मैदान में प्रचार के दौरान दावे तो साइकिल की हवा निकालने के किए गए थे, लेकिन जब ईवीएम खुली तो हकीकत सामने आ गई। जनता ने उनकी ‘फुटबॉल’ को ऐसा किक मारा कि वह चंद वोटों में सिमटकर रह गए। हालात यह रहे कि कई बूथों पर तो उनके बस्ते पर बैठने वाले कार्यकर्ताओं तक के वोट नहीं मिले और वह अपनी जमानत तक बचाने की स्थिति में नजर नहीं आए।

फिर साइकिल की सवारी की जुगत, लेकिन क्या भूल गई पार्टी?

करारी हार और जनता द्वारा पूरी तरह नकारे जाने के बाद अब एक बार फिर चुनावी मौसम आते ही डॉक्टर साहब का सपा प्रेम अचानक उमड़ पड़ा है। लखनऊ से लेकर आंवला की गलियों तक वह फिर से साइकिल की सवारी करने की पुरजोर कोशिशों में जुटे हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ता और आम मतदाता अब सवाल पूछ रहे हैं—जो नेता टिकट न मिलने पर मिनटों में अपनी विचारधारा बदल ले और पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ बगावत पर उतर आए, उस पर नेतृत्व फिर दांव कैसे लगा सकता है?

बड़ा सवाल: टिकट नहीं मिला तो इस बार कौन सा रुख?

आंवला की राजनीतिक चौपालों पर अब सबसे तीखा सवाल यही तैर रहा है कि अगर इस बार भी समाजवादी पार्टी ने उनकी बगावती पृष्ठभूमि और खराब चुनावी रिकॉर्ड को देखते हुए टिकट देने से इनकार कर दिया, तो डॉक्टर साहब का अगला कदम क्या होगा?

* क्या वह फिर से पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोलकर किसी और चुनाव चिन्ह के साथ किस्मत आजमाएंगे और पिछली बार से भी ज्यादा फजीहत कराएंगे?

* या फिर विचारधारा को ताक पर रखकर किसी अन्य दल के दरवाजे पर दस्तक देंगे?

* अथवा हार के डर से चुपचाप घर बैठ जाएंगे?

बगावत के बाद बुरी तरह पिट चुकी साख को दोबारा चमकाने की कोशिश कर रहे डॉ. जीराज यादव के लिए यह चुनाव करो या मरो जैसा है। टिकट की दावेदारी करना उनका अधिकार हो सकता है, लेकिन आंवला की जनता और समाजवादी पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता अब यह भली-भांति समझ चुके हैं कि चुनावी मैदान सिर्फ बैनर-पोस्टर और बगावती तेवरों से नहीं, बल्कि जनाधार और वफादारी से जीता जाता है। देखना यह होगा कि पार्टी हाईकमान उनके बगावती अतीत को तवज्जो देता है या फिर डॉक्टर साहब को एक बार फिर नया चुनावी झंडा तलाशना पड़ेगा।

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