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September 13, 2026

बाबा नीम करौली की कहानी: हनुमान भक्ति से लेकर कैंची धाम तक, जानिए क्यों दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं संत

उत्तराखंड । फिल्म हनुमान अंश के जरिए एक बार फिर संत बाबा नीम करौली चर्चा में हैं। उत्तराखंड के कैंची धाम से लेकर अमेरिका तक बाबा के प्रति श्रद्धा रखने वाले भक्त मौजूद हैं। उनकी सादगी, हनुमान भक्ति और उनसे जुड़ी चमत्कारों की कथाएं आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं।

कौन थे बाबा नीम करौली?

बाबा नीम करौली का मूल नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा बताया जाता है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के टुंडला क्षेत्र के अकबरपुर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा और माता का नाम कौशल्या देवी बताया जाता है।

कम उम्र में ही उनका विवाह राम बेटी शर्मा से हुआ। आध्यात्मिकता की ओर उनका झुकाव बचपन से ही बताया जाता है। बाद में उन्होंने गृहस्थ जीवन छोड़कर साधना और वैराग्य का मार्ग अपनाया। हालांकि कुछ वर्षों बाद वह परिवार के पास लौटे और उनके दो बेटे तथा एक बेटी हुए।

नीम करौली’ नाम कैसे पड़ा?

बाबा के नाम को लेकर अक्सर नीम करौरी और नीम करौली दोनों नाम सुनने को मिलते हैं। बताया जाता है कि फर्रुखाबाद जिले के नीम  करौरी गांव में रहने और साधना करने के कारण उनकी पहचान ‘बाबा नीम करौरी’ के रूप में बनी।

समय के साथ इसका प्रचलित रूप ‘नीम करौली बाबा’ हो गया। आज दोनों नामों का इस्तेमाल बाबा के लिए किया जाता है।

ट्रेन रोकने की कहानी भी है मशहूर

बाबा से जुड़ी सबसे चर्चित कथाओं में से एक ट्रेन से जुड़ी है। भक्तों के अनुसार, बाबा एक बार बिना टिकट ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में यात्रा कर रहे थे। टिकट न होने पर उन्हें नीम करौरी गांव के पास ट्रेन से उतार दिया गया।

कहा जाता है कि उनके उतरने के बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। कई प्रयासों के बावजूद ट्रेन के नहीं चलने पर अधिकारियों और यात्रियों ने बाबा से वापस ट्रेन में बैठने का आग्रह किया। बाबा के दोबारा ट्रेन में बैठने के बाद ट्रेन चल पड़ी। इस घटना को बाबा के भक्त उनकी आध्यात्मिक शक्ति से जोड़कर देखते हैं।

कैंची धाम बना सबसे बड़ी पहचान

बाबा नीम करौली की सबसे बड़ी पहचान आज उत्तराखंड का कैंची धाम है। नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित यह स्थान हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।

बताया जाता है कि 15 जून 1964 को कैंची धाम में हनुमान जी की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हुई थी। बाबा के निधन के बाद भी यह स्थान उनकी स्मृति और हनुमान भक्ति का प्रमुख केंद्र बना रहा। बाद में यहां मंदिर का निर्माण हुआ और कैंची धाम देश-विदेश में प्रसिद्ध होता चला गया।

हनुमान जी का अंश मानते हैं भक्त

बाबा नीम करौली के भक्त उन्हें हनुमान जी का अंश या अवतार मानने की परंपरा रखते हैं। बाबा की तस्वीरों में अक्सर उन्हें कंबल ओढ़े हुए देखा जाता है। उनके अनुयायी इस सादगी को उनके वैराग्य और आध्यात्मिक जीवन से जोड़ते हैं।

उनकी शिक्षाओं में प्रेम, सेवा, ईश्वर-स्मरण और सभी लोगों के प्रति समान व्यवहार पर जोर दिए जाने की बातें कही जाती हैं।

कई जगहों से जुड़ी हैं बाबा की स्मृतियां

कैंची धाम के अलावा बाबा का नाम नीम करौली हनुमानगढ़ी (नैनीताल), वृंदावन और अन्य आश्रमों से भी जुड़ा है। भक्तों के बीच उनके जीवन से जुड़ी कई चमत्कारिक कहानियां आज भी सुनाई जाती हैं। हालांकि इन घटनाओं के बारे में अधिकांश बातें भक्तों और मौखिक परंपराओं से सामने आती हैं, इसलिए इन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों के बजाय श्रद्धा से जुड़ी कथाओं के रूप में देखा जाता है।

बाबा  नीम करौली का निधन सितंबर 1973 में वृंदावन में हुआ था। उनके निधन के दशकों बाद भी कैंची धाम और उनसे जुड़े आश्रमों में श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बनी हुई है।

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