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June 13, 2026

लगातार चौथी बार बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम, आगे और महंगाई की आशंका

नई दिल्ली । देश में महंगाई की मार झेल रहे आम लोगों को एक और झटका लगा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में सोमवार को लगातार चौथी बार बढ़ोतरी की गई। पिछले 11 दिनों में ईंधन के दामों में कुल ₹7 प्रति लीटर से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके बावजूद सरकारी तेल कंपनियां अब भी भारी घाटे में चल रही हैं और विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कीमतों में और इजाफा हो सकता है।

भारतीय परिवार पहले से ही सब्जियों, खाद्य तेलों और रोजमर्रा की जरूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से परेशान हैं। ऐसे में ईंधन के दाम बढ़ने से परिवहन लागत में वृद्धि होगी, जिसका असर सीधे तौर पर बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है।

सरकारी तेल विपणन कंपनियां इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) लगातार बढ़ते घाटे का सामना कर रही हैं। पिछले 11 दिनों के दौरान पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अलग-अलग चरणों में ₹3, 90 पैसे, 87 पैसे और हाल ही में ₹2.61 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की गई है।

हालांकि बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, यह बढ़ोतरी तेल कंपनियों के नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है। अनुमान है कि कच्चे तेल की खरीद, रिफाइनिंग और खुदरा बिक्री मूल्य के बीच के अंतर को खत्म करने के लिए ईंधन की कीमतों में सैद्धांतिक रूप से ₹28 से ₹33 प्रति लीटर तक बढ़ोतरी की आवश्यकता है।

विश्लेषकों का कहना है कि राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए इतनी बड़ी बढ़ोतरी एक साथ संभव नहीं है, लेकिन आने वाले समय में चरणबद्ध तरीके से कीमतें बढ़ सकती हैं।

ईरान संकट के बाद बढ़ा दबाव

28 फरवरी से शुरू हुए ईरान संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था। इसके बावजूद भारत में 74 दिनों तक पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखा गया। इस दौरान तेल कंपनियां महंगे दाम पर कच्चा तेल खरीदती रहीं, लेकिन घरेलू बाजार में पुराने रेट पर ईंधन बेचने को मजबूर थीं।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद जब पहली बार कीमतें बढ़ाई गईं, तब तक सरकारी तेल कंपनियों का कुल घाटा ₹1.2 लाख करोड़ से अधिक हो चुका था।

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर किसी भी भू-राजनीतिक संकट का सीधा असर देश के आयात बिल और ईंधन कीमतों पर पड़ता है।

कच्चे तेल में नरमी से राहत की उम्मीद

सोमवार को वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। ईरान और अमेरिका के बीच संभावित राजनयिक समझौते की उम्मीदों के चलते बाजार में नरमी देखने को मिली। माना जा रहा है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहती हैं तो भारत में ईंधन कीमतों पर दबाव कुछ कम हो सकता है।

हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सप्लाई चेन, शिपिंग लागत और बीमा प्रीमियम जैसे कारकों के चलते निकट भविष्य में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं।

आम जनता और कंपनियों के बीच संतुलन की चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती आम जनता को महंगाई से राहत देने और तेल कंपनियों के वित्तीय संतुलन को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की है। ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का असर सीधे परिवहन, खाद्य पदार्थों और दैनिक जरूरतों की वस्तुओं पर पड़ता है, जबकि तेल कंपनियां लगातार घाटा सहने की स्थिति में नहीं हैं।

“फिलहाल उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिलने के आसार कम दिखाई दे रहे हैं और आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी की संभावना बनी हुई है”

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